Books published by Rajkamal Prakashan at best prices | Best of Rajkamal Prakashan (1658 books)

Phir Meri Yaad / फिर मेरी याद

Phir Meri Yaad / फिर मेरी याद

कोई दीवाना कहता है’ काव्य संग्रह के प्रकाशन के 12 वर्षों बाद प्रकाशित हो रहा ‘फिर मेरी याद’ कुमार विश्वास का तीसरा काव्य-संग्रह है. इस संग्रह में गीत, कविता, मुक्तक, क़ता, आज़ाद अशआर— सबकी बहार है

Bolna Hi Hai : Loktantra, Sanskriti Aur Rashtra Ke Bare Mein / बोलना ही है : लोकतंत्र, संस्कृति, और राष्ट्र के बारे में

Bolna Hi Hai : Loktantra, Sanskriti Aur Rashtra Ke Bare Mein / बोलना ही है : लोकतंत्र, संस्कृति, और राष्ट्र के बारे में

रवीश कुमार की यह किताब ‘बोलना ही है’ इस बात की पड़ताल करती है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस-किस रूप में बाधित हुई है, परस्पर सम्वाद और सार्थक बहस की गुंजाइश कैसे कम हुई है और इससे देश में नफ़रत और असहिष्णुता को कैसे बढ़ावा मिला है। कैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि, मीडिया और अन्य संस्थान एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में हमें विफल कर रहे हैं। इन स्थितियों से उबरने की राह खोजती यह किताब हमारे वर्तमान समय का वह दस्तावेज है जो स्वस्थ लोकतंत्र के हर हिमायती के लिए संग्रहणीय है. हिंदी में आने से पहले ही यह किताब अंग्रेजी, मराठी और कन्नड़ में प्रकाशित हो चुकी है.

Hum Nahi Change... Bura Na koy / हम नहीं चंगे...बुरा न कोय- आत्मकथा 'लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा |'

Hum Nahi Change... Bura Na koy / हम नहीं चंगे...बुरा न कोय- आत्मकथा 'लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा |'

लगभग 300 उपन्यास लिखने वाले सुरेंद्र मोहन पाठक ने पल्प फिक्शन को एक नया आयाम देने का काम किया है। इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज़ की नौकरी करते हुए हिंदी पल्प फिक्शन की एक मजबूत धुरी बन जाना एक असाधारण बात थी। ऐसी सफलता रातोरात नहीं आती। इन्हें भी असफलताओं ने चुनौती दी लेकिन निरंतर संघर्ष करते हुए ये लोकप्रिय साहित्य के सिरमौर बने। न केवल अपने लिए एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार किया, बल्कि हिंदी लोकवृत्त में पढ़ने की संस्कृति के बढ़ावे पर बात करते रहे। यह किताब उनकी आत्मकथा का एक तरह से दूसरा भाग है। बचपन से कॉलेज के दिनों तक की कथा ‘न बैरी न कोई बेगाना’ किताब में है। उससे आगे बढ़ते हुए संघर्ष के दिनों, जवानी, रोजगार, लेखन और गृहस्थी तक की कथा इस खंड 'हम नहीं चंगे बुरा न कोय' में है.

Article 15 / आर्टिकल 15: अब फर्क लायेंगे

Article 15 / आर्टिकल 15: अब फर्क लायेंगे

आर्टिकल 15 एक अलग तरह की अपराध कथा है। उन अपराधों की कहानी, जिनका हिस्सा जाने-अनजाने हम सब हैं। यह फ़िल्म पिछले कुछ सालों में हमारे आसपास घटी कई घटनाओं से विचलित और प्रेरित है। एक दिलचस्प थ्रिलर के रास्ते यह भारत के वर्तमान सामाजिक राजनैतिक हालात की परतें उधेड़ती है, सवाल करती है, रास्ते सुझाती है। भारतीय समाज में फ़र्क़ पैदा करने वाला सबसे बड़ा कारण 'जाति' आज भी करोड़ों लोगों को अन ज़िंदगी जीने पर मजबूर करता है, उन्हें कमतर इंसान मानता है। 'सामाजिक व्यवस्था' के नाम पर सदियों से चल रही इस नाइंसाफ़ी के सामने यह फ़िल्म भारत के संविधान को रख देती है और आँखों में आँखें डालकर हम सबसे पूछती है कि और कितने ज़ुल्म करने हैं तुम्हें?.

Bhartiya Sanskriti Aur Sex

Bhartiya Sanskriti Aur Sex

जहाँ तक 'हिन्दू संस्कृति' का प्रश्न है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुरोधाओं ने जिस रूप में इसकी व्याख्या की, पहले भी लिखा जा चुका है कि वह बहुत ही संकुचित और विकृत व्याख्या है, जो लोगों में इस संस्कृति के प्रति एक भ्रम पैदा करती है। जिन विद्वानों ने वास्तविकता पर आधारित तथ्यपरक व्याख्या की, उनको यह कहकर सिरे से खारिज कर दिया गया कि उन पर पश्चिम के विद्वानों का प्रभाव है और वे एकांगी दृष्टि से संस्कृति को देखते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि वेदों से प्रारम्भ कर भारतीय संस्कृति का समग्र रूप मनुष्य की समस्त जीवन-शैली के अच्छे-बुरे पक्ष को जाहिर करता है, जो समय के अनुसार बदलती रही है। हमारे देश में एक प्रचलन यह भी रहा है कि हम प्राचीन धार्मिक ग्रंथों पर तिलक-चंदन चढ़ाते हैं, उनकी पूजा करते हैं, पर उन्हें पढ़ते नहीं हैं। पढ़ते तो संस्कृति के नाम पर जो दुष्प्रचार किया जाता रहा है, वह सम्भव नहीं था.

Ek Tha Doctor Ek Tha Sant ( एक था डॉक्टर एक था संत: आंबेडकर- गाँधी संवाद, जाति, नस्ल, और ‘जाति का विनाश’)

Ek Tha Doctor Ek Tha Sant ( एक था डॉक्टर एक था संत: आंबेडकर- गाँधी संवाद, जाति, नस्ल, और ‘जाति का विनाश’)

वर्तमान भारत में असमानता को समझने और उससे निपटने के लिए, अरुंधति रॉय ज़ोर दे कर कहती हैं कि हमें राजनीतिक विकास और एम.के. गांधी का प्रभाव, दोनों का ही परीक्षण करना होगा। सोचना होगा कि क्यों बी.आर. आंबेडकर द्वारा गांधी की लगभग दैवीय छवि को दी गई प्रबुद्ध चुनौती को भारत के कुलीन वर्ग द्वारा दबा दिया गया। राय के विश्लेषण में, हम देखते हैं कि न्याय के लिए आंबेडकर की लड़ाई, जाति को सुदृढ़ करनेवाली नीतियों के पक्ष में, व्यवस्थित रूप से दरकिनार कर दी गई, जिसका परिणाम है वर्तमान भारतीय राष्ट्र जो आज ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र है, विश्वस्तर पर शक्तिशाली है, लेकिन आज भी जो जाति व्यवस्था में आकंठ डूबा है।

Bhimrao Ambedkar: Ek Jeevani

Bhimrao Ambedkar: Ek Jeevani

भीमराव आंबेडकर हिन्दुओँ में पहले दलित या निम्न जाति नेता थे जिन्होंने पश्चिम जाकर पीएच-डी. जैसे सर्वोच्च स्तर तक की औपचारिक शिक्षा हासिल की थी । अपनी इस अभूतपूर्व उपलब्धि के बाबजूद वह अपनी जड़ो से जुड़े रहे और तमाम उम्र दलित अधिकारों के लिए लड़ते रहे । भारत के सबसे प्रखर और अग्रणी दलित नेता के रूप में आंबेडकर का स्थान निर्विवाद है । निम्न जातियों को एक अलग औपचारिक और कानूनी पहचान दिलाने के लिए आंबेडकर सालों तक भारत के स्वर्ण हिन्दू वर्चस्त्र वाले समूचे राजनीति प्रतिष्ठान से अकेल लोहा लेते रहे । स्वतंत्र भारत की पहली केन्द्र सरकार में आंबेडकर को कानून मंत्री और संविधान का प्रारूप तैयार करनेवाली समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया । इन पदों पर रहते हुए उन्हें भारतीय राजनय पर गांधीवादी प्रभावों पर अंकुश लगाने में उल्लेखनीय सफलता मिली । क्रिस्तोफ़ जाफ़लो ने उनके जीवन को समझने के लिए तीन सबसे महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला है : एक समाज वैज्ञानिक के रूप में आंबेडकर; एक राजनेता और राजनीतिज्ञ के रूप में आंबेडकर; तथा स्वर्ण हिन्दुत्व के विरोधी एवं बौद्धधर्म के एक अनुयायी व प्रचारक के रूप मे आंबेडकर ।

Che Guevara

Che Guevara

चे को किसी ‘महामानव’ या ‘मसीहा’ के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। चे अपनी कमियों, अच्छाइयों, शक्तियों, कमजोरियों के साथ पूरी सम्पूर्णता में उस समाज के मनुष्य का, जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का न तो अस्तित्व हो और न ही सम्भावना, प्रतिनिधित्व करते हैं। इस महागाथा के सात सोपान हैं ‘बचपन के दिन’ में अर्जेन्टीना के उस जमाने के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में एक ह्रासमान बुर्जुआ अभिजात परिवार में जन्म लेने से लेकर किशोरावस्था को पार करते हुए जवानी की दहलीज तक पहुँचने की दास्तान है। ‘उत्तर की खोज में दक्षिण की राह’ अपने से काफी बड़ी उम्र के मित्र के साथ खटारा मोटरसाइकिल पर दुनिया-जहान को देखने-समझने निकल पड़ी जवानी की दहलीज चढ़ते एक किशोर की कहानी है। ‘एक बार फिर सडक़ पर’ माक्र्सवादी साहित्य के अध्येता नौजवान की डॉक्टरी पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद अपनी खुद की तलाश में एक बार फिर निकल पडऩे की कहानी है। ‘क्यूबा क्रान्ति की दास्तान’ गुरिल्ला दस्ते के डॉक्टर से गुरिल्ला लड़ाका, गुरिल्ला सेना कमांडेंट, क्यूबा क्रान्ति के विजयी कमांडर और समाजवादी क्यूबाई समाज के नवनिर्माण की मुहिम के सबसे दक्ष नायक बनने की कहानी है। ‘क्रान्तिकारी अन्तर्राष्ट्रीयता के कार्यभार’ एक बार फिर चे को सब कुछ छोडक़र अन्तर्राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्ष में लहू और बारूद की राह पकडऩे को मजबूर करते हैं। ‘शहादत की राह पर’ चे के बोलिवियाई अभियान के अद्भुत-अकल्पनीय शौर्य की दास्तान है। ‘उत्तरगाथा’ गिरफ्तारी के बाद अमेरिकी-बोलिवियाई जल्लाद मंडली के हाथों चे की हत्या और उनके दुनिया के मुक्ति-संघर्ष के प्रतीक बन जाने की कहानी है।.

Barff

Barff

सही और गलत के बीच किसी राह की तलाश की तरह है-सौरभभ शुक्ला का बर्फ | --द हिन्दू बर्फ नाटक जैसा देखने में है, जितना दिखता है, उससे कहीं ज्यादा अनुभव के स्तर पर नाटक है | --टाइम्स ऑफ़ इंडिया सच की बेहतरीन नाट्य प्रस्तुति | -- सन्डे गार्डियन बर्फ जितना भयानक है उतना ही मानवीय भी है | सौरभ ने एक पतली रस्सी पर चलने जैसा खतरनाक काम किया है, जिसमे वे पूरी तरह सफल हुए हैं | रंगमंच की दुनिया का यह चकित करने वाला काम है | -- सुधीर मिश्रा.

Yaad ki Rahguzar

Yaad ki Rahguzar

‘याद की रहगुज़र’ शौकत कैफ़ी की वह दास्तान है जिसमें उनके शौहर उर्दू के मशहूर शायर और नग़मानिगार कैफ़ी आज़मी और उनके बच्चों एक्ट्रेस शबाना आज़मी और कैमरामैन बाबा आज़मी के खूबसूरत और दिलचस्प किस्से हैं। प्रगतिशील लेखक आन्दोलन से जुड़े हुए कवियों और लेखकों का ज़िक्र है। उँ$चे सामाजिक मूल्यों के लिए संघर्ष करने वाले किरदार हैं। शौकत कैफ़ी स्टेज और फिल्म की एक बहुत मझी हुई और बेमिसाल अभिनेत्री भी हैं। ‘याद की रहगुज़र’ में उन्होंने इप्टा और पृथ्वी थियेटर से जड़े हुए अपने दिलों के बारे में कई अनोखी बातें लिखी हैं। ‘याद की रहगुज़र’ शौकत कैफ़ी के बहुरंगी अनुभवों का बयान है जिसमें जीवन के ठंडे और गरम मौसमों की तस्वीरें हैं। मानवमन का रोमांस है, हिम्मत और विजय की भावना है। बहुत सादा लेकिन अर्थपूर्व यह लेखन पाठक के दिल और दिमाग़ में अतीत से प्रेम और भविष्य के प्रति आस्था जगाता है। - असगर वजाहत.

Manto: Pandrah Kahaniya, Chayan Nandita Das

Manto: Pandrah Kahaniya, Chayan Nandita Das

दस रुपए ख़ुशिया हतक सरकंडों के पीछे सड़क के किनारे ठंडा गोश्त ख़ालिद मियाँ सिराज मोज़ेल मम्मद भाई काली शलवार सहाय टेटवाल का कुत्ता टोबा टेक सिंह सौ कैंडल पावर का बल्ब|

Rahbari Ke Sawal

Rahbari Ke Sawal

रहबरी के सवाल में चन्द्रशेखर के ही शब्दों में उनके जीवन के कुछ प्रमुख पड़ावों और विचार-बिदुओं को नए संदर्भों में नए सिरे से प्रस्तुत किया गया है। चन्द्रशेखर का जीवन मूलत: एक भारतीय किसान का जीवन था जिसमें कोई दुराव-छिपाव नहीं। राजनीति के शिखर व्यक्तित्व होते हुए भी वे किसी भी विषय पर बिना लाग-लपेट के और दो टूक बोलतेे थे। यह भी भारतीय किसान का ही स्वभाव है। चन्द्रशेखर के व्यक्तित्व को समझने में यह अवधारणा बहुत मदद देती है। वे जिस विषय पर बोलते थे, उनके विचारों के केंद्र में भारतीय समाज की परिस्थितियाँ और समाजवादी लोकतांत्रिक मूल्य प्रमुख रूप से दिखाई देते थे। अपनी वैचारिक दृढ़ता के कारण ही वे उथल-पुथल भरे राजनैतिक झंझावातों के बीच आज भी एक जलती मशाल की तरह दृष्टिगत होते हैं। इस पुस्तक के छह खंडों के नाम हैं : राजनीति के सोपान, चौदहवीं लोकसभा और संसदीय प्रणाली, यक्ष प्रश्न, नजरिया, अंतरंग तथा अनुलग्नक। इन अध्यायों में उन प्रसंगों पर विस्तृत बातचीत की गई है जो आज के संदर्भ में भी जीवंत हैं। चन्द्रशेखर का जीवन एक कभी न रुकनेवाला यायावर का जीवन था। इसमें कहीं ठहराव नहीं। यही वजह है कि उनका व्यक्तित्व उनके किसी भी समकालीन राजनैतिक व्यक्तित्व की तुलना में अधिक गतिशील दिखता है। इस पुस्तक में सार्थक और जीवंत प्रश्नों के सहारे चन्द्रशेखर के अद्यतन वैचारिक चिंतन और निष्कर्षों को दर्ज करने का ऐतिहासिक प्रयास किया गया है। ये विचार हमें आत्ममंथन के लिए तो प्रेरित करते ही हैं, भूमंडलीकरण के शोर में अपनी खोती हुई अस्मिता को बचाने के लिए नई शक्ति से भरते भी हैं। यही वजह है कि यह पुस्तक निराशा के राष्ट्रव्यापी माहौल में नई व्यवस्था बनाने के लिए एक सार्थक हस्तक्षेप की तरह है।

Jal Thal Mal

Jal Thal Mal

शौचालय का होना या न होना भर इस किताब का विषय नहीं है| यह तो केवल एक छोटी सी कड़ी है, शुचिता के तिकोने विचार में| इस त्रिकोण का अगर एक कोना है पानी, तो दूसरा है मिटटी, और तीसरा है हमारा शरीर| जल, थल और मल| पृथ्वी को बचाने की बात तो एकदम नहीं है| मनुष्य की जात को खुद अपने को बचाना है, अपने आप ही से| पुराना किस्सा बताता है की समुद्र मंथन से विष भी निकलता है और अमृत भी| यह धरती पर भी लागू होता है| हमारा मल या तो विष का रूप ले सकता है या अमृत का| इसका परिणाम किसी सरकार या राजनीतिक पार्टी या किसी नगर की नीति-अनीति से तय नहीं होगा| तय होगा तो हमारे समाज के मन की सफाई से| जल, थल और मल के संतुलन से|

Manto: 15 Stories, Selected by Nandita Das

Manto: 15 Stories, Selected by Nandita Das

Ten Rupees (Dus Rupaye), Khushiya (Khushiya), the Insult (Hatak), Behind the Reeds (Sarkandon ke Peechhe), By the Roadside (Sadak Kinare), Cold Flesh (Thanda Gosht), Khalid Mian (Khalid Mian), Siraj (Siraj), Mozelle (Mozelle), Mammad Bhai (Mammad Bhai), the Black Shalwar (Kali Shalwar), Sahay (Sahay), the Dog of Tetwal (Tetwal ka kutta), Toba Tek Singh (Toba Tek Singh), A Hundred Candle-Power Bulb (Sau Candle-Power ka Bulb).

Tum Meri Jaan Ho Raziya Bi

Tum Meri Jaan Ho Raziya Bi

इस किताब में अभिनेता, गीतकार, संगीतकार, रंगकर्मी पीयूष मिश्रा की कविताएँ हैं। बकौल पीयूष ये कविताएँ उन्होंने अपने जीवन के एक $खास दौर में लिखीं और इनका अपना एक $खास म$कसद था। ये अपने आप से, अपनी आत्मा के सच से साक्षात्कार की कविताएँ हैं। अपने आप और अपने परिजन-लोक को सम्बोधित। विपश्यना ध्यान के दौरान जब उन्हें अपने अब तक के जीवन पर दृष्टिपात करने का अवसर मिला तब उन्होंने इन कविताओं को लिखना शुरू किया।
लेकिन जैसा कि लिखी जाने के बाद हर कविता करती है, वह अपने सर्जक-भर की नहीं रह जाती। ये भी नहीं हैं। हम भी इनमें अपने आप को देख सकते हैं। मन के एकाकी कोनों से झरीं ये पंक्तियाँ कभी अपनी एक लय लेकर आती हैं तो कभी असम्बद्ध-सा दिखने वाला आत्मालाप। हम में से हर किसी को किसी न किसी मौ$के पर अपने आप से रू-ब-रू होना होता है। उन क्षणों में ये कविताएँ हमें ज़रूर याद आएँगी।

Aarambh Hai Prachand

Aarambh Hai Prachand

फिल्म ‘द लिजेंड ऑफ भगतसिंह’ के लेखन में इस संगीतमय नाटक का महत्वपूर्ण योगदान.हिन्दी की अपनी मौलिक नाट्य-लेखन और रंग-परम्परा में एक मील का पत्थर इस नाटक के लिए दिल्ली के प्रसिद्ध ‘एक्ट-वन नाट्य समूह’ और खुद पीयूष मिश्रा ने इतना शोध और परिश्रम किया था कि भगतसिंह पर इतिहास कि कोई पुस्तक बन जाती, लेकिन उन्हें नाटक लिखना था जिसकी अपनी संरचना होती है, सो उन्होंने नाटक लिखा जिसने हमारे मूर्तिपूजक मन के लिए भगतसिंह कि एक अलग, महसूस की जा सकनेवाली छवि पेश की ! सुखदेव से एक न समझ में आनेवाली मित्रता में बंधे भगतसिंह, पंडित आजाद के प्रति एक लाड-भरे सम्मान से ओत-प्रोत भगतसिंह, महात्मा गाँधी से नाइत्तफाकी रखते हुए भी उनके लिए एक खास नजरिया रखनेवाले भगतसिंह, नास्तिक होते हुए भी गीता और विवेकानंद में आस्था रखनेवाले भगतसिंह, माँ-बाप और परिवार से अपने असीम मोह को एक स्थितप्रज्ञ फासले से देखनेवाले भगतसिंह, पढ़ाकू, जुझारू, खूबसूरत, शांत, हंसोड़, इंटेलेकचुअल, युगद्रष्टा, दुस्साहसी और प्रेमी भगतसिंह ! यह नाटक हमारे उस नायक को एक जीवित-स्पंदित रूप में हमारे सामने वापस लाता है जिसे हमने इतना रूढ़ कर दिया कि उनके विचारों के धुर दुश्मन तक आज उनकी छवि का राजनितिक इस्तेमाल करने में कोई असुविधा महसूस नहीं करते ! यह नाटक पढ़े, और जब खेला जाए, देखने जाएँ और अपने पढ़े के अनुभव का मिलान मंच से करें! नाटक के साथ इस जिल्द में निर्देशक एन.के. शर्मा कि टिप्पणी भी है, और पीयूष मिश्रा का शफ्फाफ पानी जैसे गद्य में लिखा एक खूबसूरत आलेख भी, और साथ में भगतसिंह कि लिखी कुछ बार-बार पठनीय सामग्री भी|

Call Centre

Call Centre

दिलीप पाण्डेय और चंचल शर्मा की कहानियाँ हिंदी कहानियों में कुछ नए ढंग का हस्तक्षेप करती हैं। यहाँ बहुत-सी कहानियाँ हैं जिनका मैं जिक्र करना चाहता हूँ, लेकिन दो-तीन कहानियाँ तो अद्भुत हैं। आमतौर पर इस संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ दो-ढाई पेज से ज्यादा की नहीं हैं और सबका अपना प्रभाव है। कई कहानियाँ तो इतने नए अनुभव लिये हुए हैं कि हिंदी कहानी में दुर्लभ हैं।
आप 'ढेढ़-मेढ़े रास्ते’ पढ़िए। आपको लगेगा कि आप एक नए महाभारत से जूझ रहे हैं जहाँ से स्त्री-स्वाभिमान की एक नई दुनिया खुलती है। पारंपरिक स्त्री-विमर्श से अलग यहाँ एक नए तरह का स्त्री-विमर्श है। चौसर पर यहाँ भी स्त्री है लेकिन अबकी स्त्री अपनी देह का फैसला खुद करती है। इसी के उलट 'कॉल सेंटर’ स्त्री-स्वाधीनता के दुरुपयोग की अनोखी कथा है जो बहुत सीधे-सपाट लहजे में लिखी गई है। इस संग्रह की विशेषता यह है कि यहाँ कहानियों में विविधता बहुत है। यहाँ आप अल्ट्रा मॉड समाज की विसंगतियों की कथा पाएँगे तो बिल्कुल निचले तबके के अनोखे अनुभव भी, जो बिना यथार्थ अनुभव के संभव नहीं हैं। जैसे एक कहानी है-'कच्चे-पक्के आशियाने’। यह कहानी गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले बच्चों की कहानी है जहाँ एक लड़की सिर्फ जीने के लिए अपनी देह का सौदा करती है। इसका अंत तो अद्भुत है जब देह बेचने वाली लड़की उस पर आरोप लगाने वाले संभ्रांत मेहता से उनकी पत्नी के सामने कहती है कि मेहता साहब, आपके पाँच सौ रुपये मुझ पर बाकी हैं, आपकी बीवी को दे दूँगी। कहानी यहाँ संभ्रांत समाज के पाखंड पर एक करारा तमाचा बन जाती है।
कुल मिलाकर दिलीप पांडे और चंचल शर्मा की ये कहानियाँ इसलिए भी पढ़ी जानी चाहियें कि इन्होंने हिंदी कथा को कुछ नए और अनूठे अनुभव दिए हैं।
—शशिभूषण द्विवेदी

Aaj ke Aaine Me Rashtravad

Aaj ke Aaine Me Rashtravad

जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और थोथी देशभक्ति के जुमले उछालकर जेएनयू को बदनाम किया जा रहा था, तब वहाँ छात्रों और अध्यापकों द्वारा राष्ट्रवाद को लेकर बहस शुरू की गई। खुले में होने वाली ये बहस राष्ट्रवाद पर कक्षाओं में तब्दील होती गई, जिनमें जेएनयू के प्राध्यापकों के अलावा अनेक रचनाकारों और जन-आन्दोलनकारियों ने राष्ट्रवाद पर व्याख्यान दिए। इन व्याख्यानों में राष्ट्रवाद के स्वरूप, इतिहास और समकालीन सन्दर्भों के साथ उसके खतरे भी बताए-समझाए गए।
राष्ट्रवाद कोई निश्चित भौगोलिक अवधारणा नहीं है। कोई काल्पनिक समुदाय भी नहीं। यह आपसदारी की एक भावना है, एक अनुभूति जो हमें राष्ट्र के विभिन्न समुदायों और संस्कृतियों से जोड़ती है। भारत में राष्ट्रवाद स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान विकसित हुआ। इसके मूल में साम्राज्यवाद-विरोधी भावना थी। लेकिन इसके सामने धार्मिक राष्ट्रवाद के खतरे भी शुरू से थे। इसीलिए टैगोर समूचे विश्व में राष्ट्रवाद की आलोचना कर रहे थे तो गाँधी, अम्बेडकर और नेहरू धार्मिक राष्ट्रवाद को खारिज कर रहे थे।
कहने का तात्पर्य यह कि राष्ट्रवाद सतत् विचारणीय मुद्दा है। कोई अंतिम अवधारणा नहीं। यह किताब राष्ट्रवाद के नाम पर प्रतिष्ठित की जा रही हिंसा और नफरत के मुकाबिल एक रचनात्मक प्रतिरोध है. इसमें जेएनयू में हुए तेरह व्याख्यानों को शामिल किया गया है। साथ ही योगेन्द्र यादव द्वारा पुणे और अनिल सद्गोपाल द्वारा भोपाल में दिए गए व्याख्यान भी इसमें शामिल हैं।

Marfat Dilli

Marfat Dilli

दिल्ली से कृष्णा सोबती का रिश्ता बचपन से है। आज़ादी से पूर्व उनका वेतनभोगी परिवार साल के छह माह शिमला और छह माह दिल्ली में निवास करता था। अपने किशोर दिनों में वे दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हॉकी खेलती रही हैं। बँटवारे के बाद लाहौर से आकर वे स्थायी तौर पर दिल्ली की हो गईं। दिल्ली का नागरिक होने पर उन्हें गर्व भी है और इस शहर से प्रेम भी। यहाँ के इतिहास और भूगोल को वे बहुत गहरे से जानती रही हैं। दिल्ली के तीन सौ से ज़्यादा गाँवों को और उनके बदलने की प्रक्रिया को उन्होंने पारिवारिक भाव से देखा है। हर गाँव को उन्होंने पैदल घूमा है।
‘मार्फत दिल्ली’ में उन्होंने आज़ादी बाद के समय की कुछ सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक छवियों को अंकित किया है। यह वह समय था जब ब्रिटिश सरकार के पराये अनुशासन से निकलकर दिल्ली अपनी औपनिवेशिक आदतों और देसी जीवन-शैली के बीच कुछ नया गढ़ रही थी। सडक़ों पर शरणार्थियों की चोट खाई टोलियाँ अपने लिए छत और रोज़ी-रोटी तलाशती घूमती थीं। और देश की नई-नई सरकार अपनी जि़म्मेदारियों से दो-चार हो रही थी।
उस विराट परिदृश्य में साहित्य समाज भी नई आँखों से देश और दुनिया को देख रहा था। लेखकों-कवियों की एक नई पीढ़ी उभर रही थी। लोग मिलते थे। बैठते थे। बहस करते थे और अपने रचनात्मक दायित्वों को ताज़ा बनाए रखते थे। बैठने-बतियाने की जगहें, काफी हाउस और रेस्तराँ साथियों की-सी भूमिका निभाते थे। मंडी हाउस और कनाट प्लेस नए विचारों और विचारधाराओं की ऊष्मा का प्रसार करते थे।
कृष्णा जी ने उस पूरे समय को सघन नागरिक भाव से जिया। भारतीय इतिहास की कुछ निर्णायक घटनाओं को उन्होंने उनके बीच खड़े होकर देखा। आज़ादी के पहले उत्सव का उल्लास और उसमें तैरती विभाजन की सिसकियों को उन्होंने छूकर महसूस किया। बापू की अन्तिम यात्रा में लाखों आँखों की नमी से वे भीगीं। दिल्ली में हिन्दी को एक बड़ी भाषा के रूप में उभरते हुए भी देखा। इन पन्नों में उन्होंने उस दौर की कुछ यादों को ताज़ा किया है।

Jag Darshan Ka Mela

Jag Darshan Ka Mela

कुछ लेख मेरे पढ़े हुए थे, कई अन्य पहली बार पढ़े और छात्रों को भी दिए (यद्यपि आज के सामान्य छात्रों से यह आशा रखना प्राय: व्यर्थ सिद्ध होता है कि वे ध्यान दे-देकर कोई कोई किताब या लेख पढ़ेंगे)। आप सहज, पारदर्शी गद्य लिखते हैं। कई सवाल इस तरह उठाते हैं कि नया पाठक भी समझ जाए।
—प्रो. कृष्णकुमार,
इन दिनों शिक्षा को बृहत्तर आशयों और आदर्शों से काटकर ‘कौशल विकास’ में बदलने का अभियान जोर-शोर से चल रहा है। सरकारी उपक्रम हों या निजी, हर जगह शिक्षा का लक्ष्य यही मान लिया गया है कि वह इंसानों को व्यावसायिक या तकनीकी कौशल में दक्ष ‘मानव-संसाधन’ में रूपांतरित कर दे। यह ‘कौशल’ नितांत प्राथमिक धरातल का है या परम जटिल स्तर का, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। भाषा, साहित्य, कला और मानविकी आदि इन दिनों, इस शक्तिशाली ‘शिक्षा-दर्शन’ की समझ के चलते, शिक्षा जगत में हर स्तर पर जैसे दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। ऐसे समय में शिवरतनजी के लेखों को पढऩा शिक्षा के वास्तविक आशय, मूल्य-बोध और व्यावहारिक समस्याओं के निजी अनुभवों पर आधारित आकलन से गुजरना है।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
शिक्षा पर लिखने वाले अधिकतर लोग या तो किसी विचारधारा को टोहते दिखाई देते हैं या आँकड़ों का पुलिंदा खोलकर अच्छी-बुरी तस्वीर उकेरते हुए। शिक्षा पर सिद्धांतों की कमी नहीं है। इसलिए उस पर लिखनेवाले लोग इनमें से या तो किसी सिद्धांत के साथ नत्थी हो जाते हैं, या उसके किसी एक पहलू के आँकड़ों को बटोरकर प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोग कम हैं जो तमाम सिद्धांतों को पचाकर और शिक्षा की नई-नई बहसों को समझकर, लेकिन उनमें बहे बिना, स्वतंत्र होकर सोच सकें। शिवरतन थानवी ऐसे चुनिंदा लोगों में ही हैं।
—बनवारी
शिक्षक एकबारगी बस हो नहीं जाते हैं, वह होते रहने की एक अंतहीन और अनवरत प्रक्रिया है। उसके लिए चाहिए ‘प्रयोगशील सत्य’ में यकीन, और उसका व्यवहार करने का साहस और कौशल। शिवरतनजी पुरानी काट के शिक्षक हैं; लेकिन यहाँ पुराने का मतलब बीत जाने से, अप्रासंगिक या गैरफैशनेबल होने से नहीं है। उनके निबंधों में आपको एक उदग्र सजगता मिलेगी, सावधानी और चौकन्नापन। जो कुछ भी नया दिमाग सोच रहा है, उससे परिचय की उत्सुकता तो है, लेकिन वे सख्ती से हर किसी की जाँच करते हैं। ग्रहणशीलता उनका स्वभाव है और वे शिक्षा और समाज के रिश्ते के अलग-अलग पहलू पर विचार करने के लिए जहाँ से मदद मिले, लेने को तैयार हैं। उन्मुक्त रूप से लेने और देने को ही वे शिक्षा मानते हैं।
—अपूर्वानंद
शिवरतनजी पिछले छह दशकों से सक्रिय हैं और लगातार एक विद्यार्थी की निष्ठा से पूरी शिक्षा व्यवस्था को देखते-परखते और उस पर लिखते रहे हैं।... किसी किताब की प्रासंगिकता इस बात में भी होती है कि वह अपने समय के ज्वलंत प्रश्नों से कितना मुठभेड़ करती है। वह लेखक या शिक्षक ही क्या जो समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, जादू-टोने के खिलाफ न लिखे; बराबरी, सामाजिक समरसता की बात न कहे।
—प्रेमपाल शर्मा

Rangmanch Evam Stri

Rangmanch Evam Stri

सार्वजनिक स्पेस में स्त्री की आमद भारतीय समाज में एक समानान्तर प्रक्रिया रही है जिसके लिए सारी लड़ाइयाँ स्त्रियों ने खुद लड़ी हैं, बेशक कुछ सहृदय और सुविवेकी पुरुषों का सहयोग भी उन्हें अपनी जगह बनाने में मिलता रहा। रंगमंच के संसार में स्त्रियों का प्रवेश भी इससे कुछ अलग नहीं रहा। बल्कि यह कुछ और कठिन था। शुचिता-बोध से त्रस्त जो भारतीय समाज दर्शक-दीर्घा में स्त्रियों के बैठने की भी अलग व्यवस्था चाहता था वह भला उन्हें मंच पर उतरने की छूट कैसे देता? आज की यह वस्तुस्थिति कि अधिकांश मध्यवर्गीय अभिभावक बेटी को फिल्म में जाते देख फूले फिरेंगे, एक अलग चीज है, इसे न तो मंच पर आने के लिए स्त्री ने जो संघर्ष किया, उसका ईनाम कह सकते हैं और न यह कि मध्य-वर्ग स्त्री को लेकर हर पूर्वग्रह से मुक्त हो चुका है, यह उसकी किसी और ग्रन्थि का नतीजा है।
समाज की और जगहों पर स्त्री ने जैसे अपनी दावेदारी पेश की, मंच पर और परदे पर भी उसने सम्मानित जगह खुद ही बनाई। यह किताब स्त्री की इसी यात्रा का लेखा-जोखा है। पुस्तक का मानना है कि रंगमंच का डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास स्त्रियों के लिए जहाँ बहुत संघर्षमय रहा, वहीं रंगमंच ने उनके लिए एक माध्यम का भी काम किया जहाँ से उनकी इच्छाओं और आकांक्षाओं, पीड़ा और वंचनाओं को वाणी मिली।
पारसी रंगमंच ने, जो भारत में लोकप्रिय रंगमंच का पहला चरण है, इस सन्दर्भ में बहुत बड़ी भूमिका निभाई और भविष्य के लिए आधार तैयार किया। जनाना भूमिका करनेवाले पुरुषों ने उस स्पेस को रचा जहाँ से स्त्रियाँ इस दुनिया में प्रवेश कर सकीं। उन्होंने न सिर्फ स्त्रीत्व को एक नया आयाम दिया बल्कि घर के आँगन के बाहर सैकड़ों निगाहों के सामने स्त्री की मौजूदगी क्या होती है, इसका पूर्वाभ्यास समाज को कराया।
ऐसे कई चरण रहे, जिनसे रंगमंच की स्त्री को आज के अपने स्थान पर पहुँचने के लिए गुजरना पड़ा। यह किताब विभिन्न आयामों से उन तमाम परिस्थितियों और यात्राओं का आधिकारिक ब्यौरा देती है।

Pratinidhi Kahaniyan: Usha Priyamvada

Pratinidhi Kahaniyan: Usha Priyamvada

उषा प्रियम्वदा को पढ़ना एक साथ बहुत से बिम्बों में घिर जाना है। बिम्ब जो घुमड़ते बादलों की तरह अनायास तैरते चले आते हैं और एक सार्थक संगति में गुँथकर पहले दृश्य का रूप लेते हैं। कहानियों में परम्परा के निर्वहण की अभ्यस्तता और उसे तोड़ देने की सजगता एक साथ गुँथी हुई मिलती है। 1952 से 1989 तक के कालखंड में फैली उषा प्रियम्वदा की कहानियों का अधिकांश साठ के दशक में उनके विदेश प्रवास के बाद आया है। जाहिर है डायस्पोरा मनोविज्ञान रिवर्स कल्चरल शॉक से उबरने की क्रमिक प्रक्रिया को नॉस्टेल्जिया में तब्दील कर देता है। इसलिए उषा जी की कहानियों की ज़मीन भले ही विदेशी हो गई हो, वहाँ की खुली संस्कृति और उदार वर्जनामुक्त माहौल से सम्बन्धों में सहजता और कुंठाहीनता पनपी हो, लेकिन उनकी नायिका स्वयं को भारतीयता के संस्कारों से मुक्त नहीं कर पाई है। यही वजह है कि दाम्पत्येतर प्रेम सम्बन्ध बनाते हुए भी वह अपराध-बोध और लोकापवाद के भय से ग्रस्त रहती है। सरपट दौड़ते हुए अचानक ठिठक कर खड़े हो जाना, और फिर बिना कुछ कहे अपनी खोह में दुबक जाना उनकी स्त्री की विशेषता है। उषा जी बेहद महीन और कलात्मक पच्चीकारी के साथ उसके चारों ओर रहस्यात्मकता का वातावरण बुनती हैं, जो एक सम्मोहक तिलिस्म का रूप धर कर पाठक के भीतर सीढ़ी-दर-सीढ़ी उतरता चला जाता है, ठीक कृष्णा सोबती की लम्बी कहानी 'तिन पहाड़' की जया की तरह।

Pratinidhi Kahaniyan: Chitra Mudgal

Pratinidhi Kahaniyan: Chitra Mudgal

कुछ लेखक रचना के लिए सामग्री जुटाने में ही अपनी अधिकांश शक्ति व्यय कर देते हैं। उन्हें लगता होगा कि किसी परिघटना से ही महत्त्वपूर्ण या बड़ा जीवन- सत्य व्यक्त किया जा सकता है। चित्रा मुद्गल जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को चुनती हैं, उनमें व्याप्त तनाव को परखती हैं, उन्हें सामाजिकता के व्यापक धरातल पर ला खड़ा करती हैं। यह एक तरह से अकथनीय को जाहिर करने का हुनर है। उनके लिए परिवार सबसे बड़ा सच है। उनकी अधिकांश कहानियाँ विषम स्थितियों में भी रिश्तों को बचाए रखना चाहती हैं। चित्रा मुद्गल की सबसे बड़ी शक्ति है उनकी अनोखी किस्सागोई। जैसे कोई धीमी आँच वाले अलाव के पास बैठे श्रोताओं के भीतर कहानी की लौ तेज कर रहा हो। अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, कामतानाथ, विजयदान देथा की भाँति चित्राजी ने किस्सागोई या कथन-रस को नया अर्थ दिया है। उनकी कहानियाँ किसी चौंकाने वाली युक्ति या प्रयोग-विह्वल प्रयत्न से प्रारम्भ नहीं होतीं। जीवन का एक क्षण पकड़कर ये कहानियाँ आगे चल पड़ती हैं। भाषा की तमाम भंगिमाओं, कहावतों, मुहावरों, क्षेत्रीय शब्दों और उच्चारण पद्धति का साथ पाकर इन कहानियों की आन्तरिकता विकसित होती है। चित्रा मुद्गल की कहानियाँ प्रतिवाद के शिल्प में लिखी गई हैं। उनमें बदलते समय-समाज की आहटें हैं। जो कहानियाँ यथार्थ के किसी खुरदुरे हिस्से पर खत्म होती हैं, वे भी स्थितियों के प्रति आक्रोश जगाती हैं।

Books published by Rajkamal Prakashan at best prices | Best of Rajkamal Prakashan (1658 books)

Books published by Rajkamal Prakashan at best prices | Best of Rajkamal Prakashan (1658 books) Price
Phir Meri Yaad / फिर मेरी याद Rs. 159.0
Bolna Hi Hai : Loktantra, Sanskriti Aur Rashtra Ke Bare Mein / बोलना ही है : लोकतंत्र, संस्कृति, और राष्ट्र के बारे में Rs. 198.0
Hum Nahi Change... Bura Na koy / हम नहीं चंगे...बुरा न कोय- आत्मकथा 'लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा |' Rs. 239.0
Article 15 / आर्टिकल 15: अब फर्क लायेंगे Rs. 159.0
Bhartiya Sanskriti Aur Sex Rs. 100.0
Ek Tha Doctor Ek Tha Sant ( एक था डॉक्टर एक था संत: आंबेडकर- गाँधी संवाद, जाति, नस्ल, और ‘जाति का विनाश’) Rs. 113.0
Bhimrao Ambedkar: Ek Jeevani
Che Guevara Rs. 390.0
Barff Rs. 97.0
Yaad ki Rahguzar Rs. 191.0
Manto: Pandrah Kahaniya, Chayan Nandita Das Rs. 135.0
Rahbari Ke Sawal Rs. 354.0
Jal Thal Mal Rs. 291.0
Manto: 15 Stories, Selected by Nandita Das Rs. 120.0
Tum Meri Jaan Ho Raziya Bi Rs. 94.0
Aarambh Hai Prachand Rs. 91.0
Call Centre Rs. 139.0
Aaj ke Aaine Me Rashtravad Rs. 180.0
Marfat Dilli Rs. 249.0
Jag Darshan Ka Mela Rs. 256.0
Rangmanch Evam Stri Rs. 239.0
Pratinidhi Kahaniyan: Usha Priyamvada
Pratinidhi Kahaniyan: Usha Priyamvada Rs. 174.0
Pratinidhi Kahaniyan: Chitra Mudgal Rs. 174.0

Bot